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खट्टी - मीठी लाइफ

मेनस्ट्रीम होने से बहुत डर लगता उसको। बाकी देखने में काफी मेनस्ट्रीम  था। गेंहुआ रंग, सामान्य कद-काठी, कोई विशेष आकर्षण नहीं। पर वो खुद को अलग मानता था। आत्मविश्वास था उसके अन्दर। दो पल बात करने से किसी को पता चल गए। पढाई में बहुत अच्छा नहीं था, ना ही खेल कूद में। पर उस आत्मविश्वास में कुछ बात थी, किसी को भी जल्दी जीत लेता था। ईशान था वो, मेरा दोस्त।

"कवि ....कवि .....कविता, कहाँ हो? "

रविश की पुकार से मैं जैसे नींद से जागी। आज सुबह से ही याद आ रही थी ईशान की।

"हाँ, मैं यहाँ बालकनी में।"

"कवि, आज रात में कंपनी की तरफ से पार्टी है। चल रही हो ना? "

"नहीं, तुम जाओं। मेरा सर भारी लग रहा है। वैसे भी तुम्हारी ऑफिस की पार्टियाँ मुझे बोर करती हैं।"

"ठीक है, जो तुम्हे ठीक लगे।"

बालों पर हाथ फेर  कर रविश चले गए। अब तो मुझे भी प्यार हो गया है रविश से। साथ रहते रहते तो पालतू जानवर से भी प्यार हो जाता है और फिर रविश तो कितने अच्छे है। जब माँ ने मेरी शादी के लिए रविश को ढूंढा था, मेरे लिए तो बस एक अरेंजमेंट था आगे की जिंदगी बिताने के लिए। पर रविश न…

खट्टी - मीठी लाइफ-3

-------------धारावाहिक  का अंतिम अंक---------------------------------

रविश चले गए  पार्टी में। बालकनी में खड़े हो कर उनकी जाती कार को देखना अब एक रिवाज़ सा बन गया था। और रविश भी कभी हाथ हिला कर बाय कहना नहीं भूलते। मैं खुद में खोयी हुयी राह चलते लोगों को देख रही हूँ . सब आम लोग है। साधारण। लेकिन सब की एक खुद की गज़ब की कहानी है। बिलकुल विशिष्ट।

वो तेज़ कदमो से जाती हुयी लड़की को देखो। कहाँ जा रही होगी? शायद दोस्तों के संग मस्ती करने, या फिर काम करने। और वो देखो पानीपूरी वाले को। ईशान  कहता था कि  पानीपूरी वाला सबसे आमिर इंसान है, बड़े बड़े लोग कार से उतर कर हाथ जोड़ कर पानीपूरी वाले के सामने खड़े हो जाते है। कुछ भी बोलता था ईशान। अरे, वो कौन है, हाथ में डोमिनोज का पिज़्ज़ा ले कर जा रहा है, कद काठी तो बिलकुल ईशान  जैसी है। मैं तो बस अपने ख्वाब में ही थी जैसे। कोई और था, वैसे भी ईशान  की कद काठी ऐसी कॉलेज में थी। अब तो मोटा हो गया है। वो जैसे माँ के ४० साल का बच्चा भी छोटा होता है न, वैसे ही मेरे मन में भी ईशान की छवि कॉलेज वाली ही थी।


मैं तो जैसे आज यादों  के सागर में गोता लगा रही थी।…

खट्टी-मीठी जिंदगी-२

कॉलेज के दिनों से ही ईशान को कृति पसंद थी। घंटो बैठ कर हमने उसको पटाने के प्लान बनाये। राह चलते अगर मुझे कृति  दिखती थी, तो मैं ईशान को मेसेज कर देती थी, और वो उन दोनों की मुलाकात जो एक्सीडेंटल लगती थी, वास्तव में प्लांड होती थी। दिन बीतते गए और धीरे धीरे कृति और ईशान की दोस्ती बढती गयी। और एक दिन वो भी आया, जब दोनों कॉलेज के नामी कपल बन गए। मुझे लगा अब मेरे बैकग्राउंड में जाने का टाइम आ गया। 

लेकिन  नहीं, नहीं मैं कही बैकग्राउंड में नहीं गयी। ईशान  था वो। अभी भी हम पहले जितने  ही करीब थे, उतनी ही बातें करते थे, उतना ही ध्यान रखता था वो मेरा । कभी कभी लगता था कृति को देख कर कैसी लड़की है, क्यूँ इतना बात करने देती है ईशान  को। उसे शायद पता था, ईशान को बांध कर नहीं जीत सकते। जैसा ईशान, वैसी कृति। मेरी फॅमिली बड़ी हो गयी। मैं खुश थी। हँसी- ख़ुशी में दिन कट रहे थे। डोमिनोज का पिज़्ज़ा एसी में खाने में उतना टेस्टी नहीं लगता जितना रोड के किनारे फुटपाथ पर। शाम और खूबसूरत हो भी नहीं सकती थी।

धीरे-धीरे वो भी दिन आया, जब हमारा कॉलेज में आखिरी दिन था। मैं उस दिन को याद करना नहीं चाहती, और वो दिन ह…