Wednesday, March 5, 2014

बुरा भी लगता है।

एन-डी-टी-वी  के रवीश कुमार का एक इंटरव्यू देख रहा था।  हालाँकि आदत है रवीश जी को इंटरव्यू लेते हुए देखने कि पर इस बार वो इंटरव्यू दे रहे थे।  काफी रोचक व्यक्तित्व के मालिक है रवीश जी।  हर मुद्दो पर उनकी राय अनोखी होती है।  अनोखी इसलिए नहीं कि वो कुछ बड़ी बड़ी बातें करते है, या कुछ हट कर बातें करते है।  अनोखी इसलिए क्यूंकि जमीन  से जुडी बातें करते है।  ऐसा नहीं लगता कि सामाजिक - राजनैतिक विषयों का प्रकांड पंडित बातें कर रहा है, बल्कि उनकी बातें हमारी बात होती है।  बिहार के किसी छोटे कस्बे  में चल जाइये, मोहल्ले की कोने में चाय पीते हुए आम जनता सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य की ठीक उसी तरह विश्लेषण करती है जैसी रवीश जी करते है।  


मसलन  रवीश जी कहते है कि मुझे ट्रेन  के खाने से कोई शिकायत नहीं है, कौन सा बार बार खाना है, एडजस्ट कर लीजिये। मुझे याद आती है अपने पापा की, पापा के मित्र की , और ट्रैन के स्लीपर बोगी में चलने वाले सहयात्रियों की  जिनको मैंने ये बोलते सुना है।   

जिस समय में हम रह रहे है, ये समय काफी क्रन्तिकारी है।  बड़े शहरो कि बातें नहीं करूँगा।  अपने शहर कि बात करता हूँ। लड़कियोँ आगे बढ़ रही है।  पहले ट्यूशन पढ़ने के लिए भी जाती थी तो घर का कोई छोड़ने आता था।  आज मेरे साथ स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियाँ  पुणे- बैंगलोर में नौकरी करती है। अच्छा परिवर्तन है ये। आज कल दसवी बारहवी के बच्चे बाइक  पर घूमते है।  क्या ये अच्छी मजबूत होती अर्थव्यवस्था का परिणाम है ? ये हमारी सोच बदल गयी है ? साइकिल लोग खरीदते है स्वास्थ  के नाम पर, और वो भी १०-२५ हज़ार की। ऐसा नहीं लगता कि साइकिल इसलिए ख़रीदा गया क्यूंकि साइकिल चलना कूल है? वर्ना ३००० में  भी साइकिल मिलती है।  बनावटीपन बढ़ गया है समाज में। मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा हूँ, बुरा भी लगता है।

Tuesday, March 4, 2014

वो (भाग १ )

कहने को तो कई साल बीत गए. बात भी नहीं होती अब तो उस से ज्यादा। हाँ, कभी कभार बात होती है. कुछ ख़ास नहीं, बस दुआ-सलाम और हाल-चाल।  दिल की बातें जुबान से कहीं भी नहीं जाती और मैं क्या कोई भी कह नहीं पाता होगा। पर उम्मीद करता हूँ सब पता ही होगा उसे, जो नहीं कहा शायद वो भी।  समय भागा जा रहा है।  मुश्किल है इसके साथ चलना। पीछे पलट कर देखना तो भूल ही जाओ, बस किसी तरह बस हर वक़्त कोशिश करता हूँ  ज्यादा पीछे ना छूट जाऊं। सिनेमा - कहानियाँ कोई यूँ ही नहीं लिखता। अंदर एक कोने में दबे हुए किस्से होते है, जो वक़्त- बेवक़्त छोटी - छोटी चीज़ों से याद आ जाती है।  और मेरे साथ, शायद ये कुछ ज्यादा ही होता है।
कितने साल से मेरे बैग में उसकी कलम  है।  उसने माँगा भी था कभी, और मैंने वापस करने का वादा भी किया था।  कह नहीं सकता कि मैं भूल गया या भूलने का नाटक किया, पर नतीज़ा ये है कि  मेरे बैग में अभी भी उसकी कलम है।  नहीं देना चाहता वापस।
अधूरी कहानियाँ अच्छी नहीं लगती। बेचैन करती है, अंत जानना जरुरी होता है।  पर क्या अंत होता है किसी कहानी का।  नहीं होता है, बस कहानी का एक भाग ख़त्म होता है।  कहानी के एक भाग से दूसरे भाग में  ज्यादा परिवर्तन नहीं होना चाहिए। अगर होता है तो दुःख होता है जब तक कि आप परिवर्तनो को गले से ना लगा लो। 
ये आदत भी बुरी चीज़ है।  नींद में हाथ टटोलते हुए फ़ोन ढूँढना और खुद बा खुद फ़ोन लगाना।  समय लग गया ये सब छोड़ने में।  अब तो नींद टूट जाती है।  फ़ोन में कुछ फ़ोटो देख लेता हूँ और  झरोखों  से चाँद देखते हुए सोने कि कोशिश  करता हूँ।  चाँद उतना ही खूबसूरत है।  कभी-कभी तो लगता है कि चाँद चिढ़ाता रहता है मुझे।

नादान है चाँद। मैं मुस्कुरा देता हूँ उसकी नादानी पर।
अभी ऑफिस में हूँ।  चाय पीने कि तलब हो रही है।  दूसरे सभी काम कर रहे है। तेज हाथो से कीबोर्ड पर थप्पड  मारती आवाज़ें गूंज रही है।  अकेले जाना होगा चाय पीने। पहले कॉलेज में ये चाय पीने का कार्यक्रम १ घंटे से कम का नहीं होता था।  अपने हॉस्टल से उसके हॉस्टल से जाने में अजीबोगरीब बातें सोचता था और फिर हम दोनों उन बातों पर और कहानियाँ बना कर हँसते  थे।
क्रमशः अगले पोस्ट में