Saturday, July 29, 2017

माना की हम यार नहीं

जब वो मुझसे अलग हुयी तो मुझे लगता था कि कुछ समय बाद मुझे उसके नाम से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरा बाथरूम में रोना, फ़िल्मी गानों में उसको देखना और ऐसे तमाम हज़ार सिम्प्टम जो मेरे बेइन्तेहाँ प्यार में होने की कहानी बयां कर रहे थे - मेरे हिसाब से सब अस्थाई थे। पर आज जब मैं ये लिख रहा हूँ तो उस से मिले हुए सात साल हो चुके है और उफ़, सालों  बाद भी कुछ नहीं बदला। वो फेसबुक के फीड में उसकी फ़ोटो को देख कर दिल वैसे ही ठहर जाता है जैसे सात साल पहले होता था। रोमांटिक गानों  में आज भी मैं हीरो हूँ और वो ही हिरोइन है।  साला गलत टाइम पर  पैदा हो गए। व्हाट्सएप्प और फेसबुक के दौड़ में आपके फीड में उसकी फ़ोटो अपने आप आ जाती है।  आप हो ही इतने कूल की बाकी आधे आशिक़ और हाफ गर्लफ्रेंड की तरह सोशल नेटवर्किंग साइट पर ब्लॉक नहीं कर सकते क्यूंकि ब्लॉक तो आमच्योर लोग करते है। हम तो भाई , पैदा ही मैच्योर हुए थे। काश उस ज़माने में पैदा होते जब दो पुराने प्रेमी एक दूसरे को कही इत्तेफ़ाक़ से मिलते थे।

मेरी कहानी में उसका नाम नहीं लिखना चाहता हूँ। पर दो घण्टे सोचने के बाद भी कोई और उसके नाम के साथ न्याय नहीं कर पा रहा है। ओम शांति ओम का गाना है ना - " मैं  अगर कहूं की तुम सा हसीं, कायनात में नहीं है कोई ", ये गाना उस पर बिलकुल फिट बैठता है।  हाँ-हाँ आपकी मैडम पर भी फिट बैठता होगा।

वो लोग सोचते है ना की अगर समय में वापस जाने का मौका मिलता तो कितना कुछ अलग़ करते। मैंने भी रात के अँधेरे में, पंखो को देखते हुए कई बार सोचा है कि  मैं अलग क्या करता।  जो कुछ भी अलग करने की सोचता हूँ उसमे कुछ ना कुछ फाल्ट ही नज़र आता है।  ऐसा लगता है जैसे जो हुआ वही बेस्ट है।  शायद कुछ अलग होता तो इतना खूबसूरत नहीं होता।

दुरी का अपना मज़ा है। छोटी छोटी चीज़ों में उसको याद करना।  उसके चेहरे के भाव का अनुमान लगाना।  अच्छा लगता है जब कोई गाना उसकी याद दिलाता है।  मैं अक्सर वो गाने सुनता हूँ जो हम दोनों से जुड़ी है। ये गाने नाव की तरह होती है।  वो नाव जो याद रूपी समंदर में चलती है। याद दिलाती है उसके बालो के सुगंध की, उसके शोख आँखों की, आँखों के काजल की और उसकी हँसी। सब मेरे याद में सुरक्षित है।

पता नहीं उसको मेरी याद भी है या नहीं ?

"क्या फर्क पड़ता  है।" ऐसा सोच  कर हम तो भाई दिल को सांतवना पुरुस्कार देना चाहते है, पर सच तो ये है कि  फर्क पड़ता  है। मैसेज आया उसका तो वो बटरफ्लाई इन स्टमक वाली कहावत चरितार्थ हो गयी। जवाब देने से पहले भावनाओं के भॅवर में ऐसा फसा की शब्द ही नहीं टाइप हो रहे थे।  एक लाइन के रिप्लाई के लिए भी काम से काम २७७ बार लिखा और मिटाया।

 जी करता है की बस उसे जा कर देख लूँ , कुछ न बोलूं। शब्द बेमाने होंगे वहाँ , सच तो सिर्फ आँखें ही बोलेंगी।  अब आँखों से झूठ बोलवाना कठिन काम है।  शायद मैं मुस्कुराऊंगा। शायद वो किसी और के साथ होगी। मुझे डर है की मेरी मुस्कान कोई और न पढ़ ले।

जब वो जा रही होगी, शायद वो एक दफा पलट के मुस्कुराएगी।वो मुस्कान , जिसमे एक गुड बाय होगा, जिसमें अपनी कहानी का सारांश होगा, जो शायद सिर्फ मैं पढ़ पाउँगा।