Thursday, April 20, 2017

A day in a life of Gully Cricketer


The hurt ego


It is 4:30 in the evening. I can hear the stadium roaring with noise. Players are on the ground. Stretching themselves, warming up for the match. It's going to be an important match. The pride of our gully should be intact. Last time, that team from neighbouring colony won and they have mocked me every time they got a chance. Even in the school bus! 

But what is the best bowler of our gully doing? 

Holding a pencil; pretending to study but alert enough to keep an eye on dear mother. Finally, the long hot summer made my mother blink her eyes longer than she would like to. And whoosh, I am gone with the winds. Look at me! Coming out of my own house like a thief without making any noise else, mother will wake up and the pride of gully would have to wait for some more days to return.

You think it’s easy


Finally, I reach the ground with a serious face only suited to me as a senior player. I am 13. Come on!! I need to guide these 9-year-olds. Poor souls, they dropped too many catches last time and our pride slipped because of that. Look at them, making noise, practicing undertaker's moves while everything is at stake. God! I can't even drop them from the team because of two reasons:

a. These kids will complain to their mother and they will complain to my mother. 

b. We need fielders.

I scream at the top of my lungs and everyone can hear me. But they ignore and continue what they are doing. After about 10 minutes of antagonizing wait, the rivals came. There are 10 other matches going simultaneously on the ground. 

We have three stumps and one guy walked 22 steps to mark the 22 yards pitch. Yeah yeah, Its always 22 yards this way; doesn't matter if you are 10 years old or 25 years old. Makes sense actually, the 22 yards should be directly proportional to your arm's strength. 


Some guys are fighting over bowler's end wicket. There is a small patch of grass in the ground and it was decided the fielder fielding over the grass patch has to volunteer his chappal for the bowler's end wicket.




The show begins


All the 9-year-olds are given 3 easy deliveries and then they are retired hurt. If someone disagrees, we threaten him with a fast bowl and there they are, scared, ready to get retired hurt from batting then actually getting hurt. 

One player of the batting team will act as an umpire and believe me, its the hardest job. Its more of a diplomatic post than the actual umpiring. An umpire is expected to foster good relation with opponents as well as increase a run or two in his team's score every now and then. The testing phase of umpiring is when he has to turn a full toss resulting in catch out of a good batsman into a no ball. Well, run out is by default a not out until it's so obvious that your conscience starts pressurising you to give it a runout.

The chaotic state of our Eden Garden

As i said, the field, our beloved Eden Garden, is in a state of chaos. There are too many matches going on. Under 50, under 30, under 20, under 15, under 10; there is a bell curve of the distribution of the age of the players. And there was a time when we did run out by collecting the tennis ball of some other team while the ball of our match was safely outside the boundary.

By the way? What was the boundary? On your right, Can you see that cow dung behind that red shirt guy? In the front side, we have that patch of grass. On left, we have the stumps of the other team playing. Now as we know, there is a virtual circle passing through these three non co-linear lines. We will take a huge compass and keep the center at 11th yard from the stumps on the pitch, we will draw a circle passing through the cow dung, the stumps of other team and the grass patch. And Eureka; we have a boundary. No run behind the wicket. Wicket-keeper is from the batting team.  


Chucking. Sorry! What?

At a crucial stage of the game, our bowler is bowling well. He bowls faster and what! The opposition umpire is raising an objection. Umpire says the bowler is chucking. All the fielding players at once run to the umpire and sensing the danger, the batting team players run there too. There is a risk of a fight as we are telling them that everyone chucks here and it was pre-communicated. Jhunna, from the batting team, has chucked and bowled faster than our bowler. We did not object then. Just because they are losing now, they are objecting. What nonsense. Ah, this is a moral victory for sure. The opposition is scared.

The sweet revenge

And we won. Our team is poking fun at them. And the 12 years old senior from their team has come complaining to me about the kids yelling "loser loser". He is the same guy from my school bus. I ask kids to stop calling them loser while I yell, "loser, I asked them to stop calling you by your real name."






Saturday, April 15, 2017

Arrah - The story of 1857


बिहार का एक दबंग जिला है - आरा।  यूँ तो टशन पूरे बिहार वालो में होता है, पर आरा वालों  की बात ही अलग है।  "आरा जिला घर बा कउन बात के डर बा " जैसी प्रसिद्ध नारों  के बावजूद आरा वाले काफी कमजोर दिल के है, वरना  आप ही बताइये लिपिस्टिक से लगाने से कौन से ज़िले में भूकंप आता है।  जी हाँ , मैं बात कर रहा हूँ पवन सिंह के लोकप्रिय गाने "लगवाले  तू लिपस्टिक तो हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट की"

आरा के इतिहास की बात करे तो १८५७ के अंग्रेजो के खिलाफ हुयी भारत के स्वतंत्रता की पहली  लड़ाई में आरा का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है। जॉन जेम्स हॉल की १८६० में छपी किताब "टू  मंथ्स  इन आरा" में इस घटना का विस्तृत वर्णन है।  जॉन जेम्स हॉल किताब की शुरुवात एक अंग्रेजी अफसर के दिनचर्या के वर्णन से करते है।  वो कहते है की "एक अंग्रेजी अफसर सवेरे उठता है, टहलने जाता है, नास्ता करता है और कचहरी जाता है। कचहरी के बाद बिलियर्ड्स रूम और अपनी पत्नी के साथ टहलने के बाद रात का खाना और एक कप कॉफ़ी के बाद सोना, वो भी अगर आप गर्मी और मच्छर  को झेल सको तो" हॉल आरा का वर्णन कुछ ऐसे करते है - "आम के बागान के बाद एक भव्य मस्जिद आपका स्वागत करती है और उसके बाद शुरू होता है आरा शहर। छोटे छोटे घर, सुन्दर बालकनी काफी अच्छे लगते हैंपर आस पास की गरीबी और खुले नाले एक दूसरी कहानी बयाँ  करती  है।  एक मील  चलने के बाद रास्ता बायीं ओर  जाता है  जहाँ महाजनों  के घर आते है। महाजन धनाढ्य है। ये रास्ता आगे चलने पर एक बाज़ार  में तब्दील हो जाता है, जिसकी एक छोर पर जेल है और दूसरी छोर  पे जज कोठी। बाजार से थोड़ी दूर पर ही कचहरी है।" वास्तव में आज भी आरा का ढ़ाँचा हॉल के वर्णन जैसा ही है।  हॉल के अनुसार सिपाही विद्रोह की ख़बर  के साथ ही आरा के अँगरेज़ अफसरों ने अपने बीवी-बच्चो को दानापुर भेज दिया जहॉ अंग्रेज़ो के दसवीं रेजिमेंट पर उनकी सुरक्षा का दायितव  था। अँगरेज़ महिलाये और बच्चों  को  गंगा नदी के रास्ते नाव द्वारा दानापुर भेजा गया। मेरठ, संथाल परगना में विद्रोही सिपाहियों के द्वारा अंग्रेज़ो को जान से मारने की घटनाओं  को देख कर ईस्ट इंडिया रेलवे के इंजीनियर बॉयल ने १७ जून १८५७ ने आरा में बिलियर्ड रूम के आगे एक दीवार का निर्माण कराया। ये बिलियर्ड रूम आपात स्तिथि में एक सुरक्षित गढ़ की तरह बना था।नयी दीवार विद्रोही सिपाहियों की गोली झेलने लायक थी और दीवार में बन्दूक रखने के लिए जगह जगह छेद  छोड़े गये ताकि अँगरेज़ विद्रोहियों पर गोली चला सके। बॉयल ने उस घर में रासन , पानी और शराब की व्यवस्था कर ली। उसे उम्मीद थी की अंग्रेज़ो को बिलियर्ड्स रूम में कुछ दिन रहना पर सकता है।  तब तक दानापुर से ५० सिख सिपाहियों की फौज भी अँगरेज़ अफसरों की मदद के लिए पहुंची जिनका नायक हूकन सिंह बात बात पर "परवाह नहीं" कह कर अंग्रेज़ो को उनकी सुरक्षा का दिलासा देता था।  हालाँकि अंग्रेज़ो को सिख सैनिको पर भी संदेह था पर कुछ ही दिनों में उनका संदेह दूर हो गया।  २७ जुलाई की सुबह आख़िरकार अँगरेज़ सेना की सातवीं , आठवीं और चालीसवीं रेजिमेंट ने आरा ओर धावा बोल दिया। विद्रोहियों ने अपना सरदार जगदीशपुर के राजपूत ज़मींदार बाबू वीर कुंवर सिंह को घोषित  किया।  विद्रोहियों ने आरा के सरकारी ख़ज़ाने को लूटा और जेल में बंद तमाम बंदियों को आज़ाद करा दिया। अँगरेज़ अफसरों को उम्मीद थी कि दानापुर से अँगरेज़ फौज दिनों के भीतर उनकी मदद को  जाएगी।जब दिनों तक अँगरेज़ फौज नहीं पहुंची तो बिलियर्ड्स रूम के अंदर पानी की कमी होने लगी।  ये देखते हुए महज घंटे के भीतर सिख फौज ने १२ फ़ीट गहरी कुआँ  खोद डाली। इधर पटना से अंग्रेज़ो की पहली फौज जो आरा में मदद के लिए आयी, उसे विद्रोही सिपाहियों ने आम के घने बाग़ में घात लगा कर हमला किया और वापस जाने पर मजबूर कर दिया।  आखिरकार  अंग्रेज़ो ने विन्सेंट आयर  के नेतृत्व में ३० जुलाई १८५७ को आरा पर हमला किया और बिलियर्ड्स रूम में बंद अँगरेज़ अफसरों को छुड़ाया। बाबू वीर कुंवर सिंह जो विद्रोहियों के सरदार थे; वो ८० वर्ष के थे।  इस उम्र में भी उन्होंने आरा की लड़ाई के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उन्होंने आरा के बाद लखनऊ में नाना साहेब के साथ मिलकर १८५८ में आजमगढ़ पर कब्ज़ा किया। बाबू वीर कुंवर सिंह के बारे में कहा जाता है की उन्होंने ब्रिगेडियर डगलस की गोली लगने के बाद अपने हाथ को अपनी ही तलवार से काट कर गंगा को समर्पित कर दिया। ८० साल की उम्र में ऐसा हौंसला कम  ही देखने को मिलता हैं। आज भी वो बिलियर्ड हाउस आरा में उपस्तिथ है और अपने जीर्णोद्धार की बाट  जोह रहा है।  हालाँकि सरकार ने बिलियर्ड हाउस को बाबू वीर कुंवर सिंह संग्रहालय घोषित  किया है पर वहाँ देखने के लिए शायद ही कुछ है।

बिलियर्ड रूम 

आज आरा की पहचान यहाँ के युवा है। आप इस जिले के किसी कोने में चले जाइये।सुबह सुबह  सेना/पुलिस भर्ती के लिए दौड़ते लड़के मिल जायेंगे। सरकारी नौकरी का यहाँ चस्का है।  बैंक / रेलवे / सचिवालय की नौकरी के लिए तैयारी  करते लड़के/लड़की आपको ट्यूशन जाते दिख जायेंगे। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरी में फर्राटेदार अंग्रेजी की जरूरत को देखते हुए शहर में अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ गयी है जहाँ उनके नाम के सिवा कुछ भी अंग्रेजी नहीं होता और अभिवावकों  से अनाप शनाप पैसे वसूले जाते है। स्टेशन से गोपाली चौक जाने पर आपको हज़ारो कोचिंग सेंटर के बैनर लगे मिलेंगे जो आपको आई आई टी से लेकर  बैंक पी. तक बनाने का दावा  करते है।  भोजपुरी आरा की जान है। भोजपुरी सिनेमा के पोस्टर राह चलते आपको दिखेंगे। नुक्कड़ों पर पवन सिंह के गाना सुनेंगे। आस पास के गाओं  की जनता बाजार करने आरा आती है। आरा के बाजार आपको दिन में लोगो से ठसाठस भरे मिलेंगे।  रोड की चौड़ाई  १८५७ के बाद से शायद ही बदली है और जनसँख्या उसे से कई गुणा अधिक। अगर चेन्नई  में आपको इडली - डोसा, दिल्ली में आलू पराठा और कोटा में पोहा जलेबी के ठेले राह चलते दिख जाते है तो आरा में लिट्टी चोखा बिकते दिखेंगे। और अगर आप मीठे खाने के शौक़ीन है तो आरा का खुरमा काफी प्रसिद्ध है।
लिट्टी चोखा 

You can read the original book Two months at Arrah by clicking here.
Further reading: click here.
  

Wednesday, April 12, 2017

Gaja - The Bangalore traffic diary

Gaja.

Do you know Gaja?

I doubt you do. Gaja is a rebel. He stands for everything that is not socially accepted. Don't believe me? Tell me who negotiates with the car driver in the Bangalore traffic jam and asks him to pull back his car by 15 mm so that Gaja could guide his bike in that narrow space. And where does that narrow space lead to? It goes to the left most edge of the road where he can diligently glide through between the feet-tall footpath and the column of cars. Gaja doesn't have a helmet. His bike has bruises, possibly it has encountered other Gajas over time. His bike is a slave. It's dolled up with cheap decorations. Take the tail lamp, for instance, it has a black sheet covering with "GAJA" cut out in Calibri. It has Mahesh Babu's picture on the front mud guard. But these decorations fail to hide the cuts and scratches. The graphics of TVS are sliced possibly with some rogue truck's dangling parts. One can only guess.

Gaja is not reckless. He is careful to wear shoes. Once an auto drove over his toe, and mind you, the auto driver turned back, realized his mistake, spit a cough on the road and apologized in the most unapologetic voice ever. Gaja forgave him. Gaja has heart of gold. He knows such things happen on a crowded road. That's just the part of life. That auto driver shares the same traffic cutting attitude as Gaja does. Everything is fair in traffic and on road.

This traffic cutting skill has more takers than engineers in India.

"We have enough of them", told a startup founder sipping tea and hiding his cigarette from the police car, when asked about hiring engineers.

"The real MVPs are the traffic cutters. The whole food delivery industry relies on this. Oh! And Gaja, he is an asset. He had more people bidding to hire him than Ishant Sharma in IPL auction", he further delved into the topic.

Meanwhile, the Police has deployed their speed interceptor vans to record the speed of Gaja.

"We are tired of catching speed violators and people riding pillion without helmet.", a traffic cop was quoted.

"Our job is very monotonous. Everyday is the same. We don't have exciting work culture here. Amidst this, Gaja is a fresh, happy change. We want to add Gaja's name to Limca book of records for maximum speed in Bangalore traffic",  he further added.

The traffic light was still red but Gaja; he was not stopping or stick to check his phone or look for the hoardings that say you need just Rs. 6999 to get into your boss's shoes. Well, My boss wears 200 bucks Bata slipper. Bitch Please. Gaja is speeding. He is at his destination. The traffic light is yet to get green.

Oh, Gaja. You beauty.


Sunday, April 9, 2017

कुंजिका - धैर्य

हालिया संपन्न हुई भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला के तीसरे टेस्ट में चेतश्वर पुजारा ने अपनी पारी में ५२५ गेंदे खेली। ऐसी लम्बी पारी खेलना कतई आसान काम नहीं है। गेंदबाज़ की बस एक गेंद पर आपको गलती करनी है और हो गये आऊट। मैदान की क्षेत्ररक्षण रणनीति देख कर अनुमान लगाना की गेंदबाज़ कहाँ गेंद डालेगा, टप्पा खाने के बाद गेंद को पढ़ना की ये बहार की ओर जाएगी या अंदर, सीधी रहेगी या उछलेगी; इसके बाद गेंद के साथ समुचित न्याय करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। और फ़र्ज़ कीजिये की आप ये १६ घंटे करेंगे , गेंद दर गेंद ५०० से ज्यादा गेंदों तक। क्या एकाग्रता चाहिए होगी ऐसी बल्लेबाजी के लिए। गली क्रिकेट में हम गेंद बिना रन के जाने पर उतावले हो जाते हैं , वही पुजारा ने १६ घंटे अनुशासन बनाये रखा। अदभुत।

क्या हम पुजारा से अच्छी तरह जीने की कला सीख सकते है ?

क्या हम रोजमर्रा की जिंदगी को धैर्य और परिस्थी के अनुसार नहीं जी सकते ?

आज का ज़माना प्रतिस्पर्द्घा का है। कंपनीयां अपने कर्मचारीयों को तयशुदा मानदंडों पर नापती है। ये प्रक्रिया कुछ ऐसी
है कि हर कोई एक जैसी रेटिंग नहीं पा सकता। कोई दो मनुष्य एक से नहीं हो सकते , आखिर मनुष्य कोई फैक्ट्री से उत्पादित वस्तु तो है नहीं। ऐसे में सभी को एक से मानदंड में नापना एक गलत प्रक्रिया है। ये कॉर्पोरेट लीडर्स के लिए एक विमर्श की वस्तु है।
 
हर व्यक्ति को काम उसकी शक्तियों और को ध्यान में रखते हुए देना चाहिए।कर्मचारियों के बीच प्रतिस्पर्धा ने कंपनियों को आगे जरूर बढ़ाया लेकिन एक बड़े मूल्य पर। आज अवसाद और तनाव महामारी की तरह फैल रही है।कम समय में ज्यादा
पाने की चाह ने ऑफिस को और घर को एक सा कर दिया है। आप घर में हो या ऑफिस में, आपके दिमाग में काम ही चल रहा होता है। इतना ही नहीं, प्रतिस्पर्धा ने नकारात्मक सोच को भी बढ़ावा दिया है। एक दूसरे की बुराई हमारे दिमाग कि रचनात्मक क्षमता को कम कर रही है। एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के ४० प्रतिशत कॉर्पोरेट कर्मचारी मानसिक अवसाद के शिकार है क्या ये बात चिंतनीय नहीं है ? हम किस तरह भारत को आगे बढ़ाएंगे अगर हमारे कर्मचारी ही १०० फीसदी स्वस्थ नहीं होंगे ?


ऐसे मौको पर मुझे पुजारा की पारी की याद आती है। हमारा जीवन एक टेस्ट मैच की तरह है और हर दिन गेंद की तरह। हमें पुजारा की तरह धैर्य और आत्मविश्वास रखना होगा। कोई दिन बुरा होगा और उस दिन हमें सर झुका कर गेंद को विकेट कीपर के पास जाने देना होगा। हो सकता है पूरा ओवर की सभी गेंदे बुरी आएं, उन मौकों पर हमें याद रखना होगा कि आगे अच्छे दिन आएंगे। जब भी अच्छे दिन आये तो हमें रन मिलेंगे। बस विकेट पर टिक कर खेलना होगा।