कुंजिका - धैर्य

हालिया संपन्न हुई भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला के तीसरे टेस्ट में चेतश्वर पुजारा ने अपनी पारी में ५२५ गेंदे खेली। ऐसी लम्बी पारी खेलना कतई आसान काम नहीं है। गेंदबाज़ की बस एक गेंद पर आपको गलती करनी है और हो गये आऊट। मैदान की क्षेत्ररक्षण रणनीति देख कर अनुमान लगाना की गेंदबाज़ कहाँ गेंद डालेगा, टप्पा खाने के बाद गेंद को पढ़ना की ये बहार की ओर जाएगी या अंदर, सीधी रहेगी या उछलेगी; इसके बाद गेंद के साथ समुचित न्याय करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। और फ़र्ज़ कीजिये की आप ये १६ घंटे करेंगे , गेंद दर गेंद ५०० से ज्यादा गेंदों तक। क्या एकाग्रता चाहिए होगी ऐसी बल्लेबाजी के लिए। गली क्रिकेट में हम गेंद बिना रन के जाने पर उतावले हो जाते हैं , वही पुजारा ने १६ घंटे अनुशासन बनाये रखा। अदभुत।

क्या हम पुजारा से अच्छी तरह जीने की कला सीख सकते है ?

क्या हम रोजमर्रा की जिंदगी को धैर्य और परिस्थी के अनुसार नहीं जी सकते ?

आज का ज़माना प्रतिस्पर्द्घा का है। कंपनीयां अपने कर्मचारीयों को तयशुदा मानदंडों पर नापती है। ये प्रक्रिया कुछ ऐसी
है कि हर कोई एक जैसी रेटिंग नहीं पा सकता। कोई दो मनुष्य एक से नहीं हो सकते , आखिर मनुष्य कोई फैक्ट्री से उत्पादित वस्तु तो है नहीं। ऐसे में सभी को एक से मानदंड में नापना एक गलत प्रक्रिया है। ये कॉर्पोरेट लीडर्स के लिए एक विमर्श की वस्तु है।
 
हर व्यक्ति को काम उसकी शक्तियों और को ध्यान में रखते हुए देना चाहिए।कर्मचारियों के बीच प्रतिस्पर्धा ने कंपनियों को आगे जरूर बढ़ाया लेकिन एक बड़े मूल्य पर। आज अवसाद और तनाव महामारी की तरह फैल रही है।कम समय में ज्यादा
पाने की चाह ने ऑफिस को और घर को एक सा कर दिया है। आप घर में हो या ऑफिस में, आपके दिमाग में काम ही चल रहा होता है। इतना ही नहीं, प्रतिस्पर्धा ने नकारात्मक सोच को भी बढ़ावा दिया है। एक दूसरे की बुराई हमारे दिमाग कि रचनात्मक क्षमता को कम कर रही है। एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के ४० प्रतिशत कॉर्पोरेट कर्मचारी मानसिक अवसाद के शिकार है क्या ये बात चिंतनीय नहीं है ? हम किस तरह भारत को आगे बढ़ाएंगे अगर हमारे कर्मचारी ही १०० फीसदी स्वस्थ नहीं होंगे ?


ऐसे मौको पर मुझे पुजारा की पारी की याद आती है। हमारा जीवन एक टेस्ट मैच की तरह है और हर दिन गेंद की तरह। हमें पुजारा की तरह धैर्य और आत्मविश्वास रखना होगा। कोई दिन बुरा होगा और उस दिन हमें सर झुका कर गेंद को विकेट कीपर के पास जाने देना होगा। हो सकता है पूरा ओवर की सभी गेंदे बुरी आएं, उन मौकों पर हमें याद रखना होगा कि आगे अच्छे दिन आएंगे। जब भी अच्छे दिन आये तो हमें रन मिलेंगे। बस विकेट पर टिक कर खेलना होगा।


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