Saturday, April 15, 2017

Arrah - The story of 1857


बिहार का एक दबंग जिला है - आरा।  यूँ तो टशन पूरे बिहार वालो में होता है, पर आरा वालों  की बात ही अलग है।  "आरा जिला घर बा कउन बात के डर बा " जैसी प्रसिद्ध नारों  के बावजूद आरा वाले काफी कमजोर दिल के है, वरना  आप ही बताइये लिपिस्टिक से लगाने से कौन से ज़िले में भूकंप आता है।  जी हाँ , मैं बात कर रहा हूँ पवन सिंह के लोकप्रिय गाने "लगवाले  तू लिपस्टिक तो हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट की"

आरा के इतिहास की बात करे तो १८५७ के अंग्रेजो के खिलाफ हुयी भारत के स्वतंत्रता की पहली  लड़ाई में आरा का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है। जॉन जेम्स हॉल की १८६० में छपी किताब "टू  मंथ्स  इन आरा" में इस घटना का विस्तृत वर्णन है।  जॉन जेम्स हॉल किताब की शुरुवात एक अंग्रेजी अफसर के दिनचर्या के वर्णन से करते है।  वो कहते है की "एक अंग्रेजी अफसर सवेरे उठता है, टहलने जाता है, नास्ता करता है और कचहरी जाता है। कचहरी के बाद बिलियर्ड्स रूम और अपनी पत्नी के साथ टहलने के बाद रात का खाना और एक कप कॉफ़ी के बाद सोना, वो भी अगर आप गर्मी और मच्छर  को झेल सको तो" हॉल आरा का वर्णन कुछ ऐसे करते है - "आम के बागान के बाद एक भव्य मस्जिद आपका स्वागत करती है और उसके बाद शुरू होता है आरा शहर। छोटे छोटे घर, सुन्दर बालकनी काफी अच्छे लगते हैंपर आस पास की गरीबी और खुले नाले एक दूसरी कहानी बयाँ  करती  है।  एक मील  चलने के बाद रास्ता बायीं ओर  जाता है  जहाँ महाजनों  के घर आते है। महाजन धनाढ्य है। ये रास्ता आगे चलने पर एक बाज़ार  में तब्दील हो जाता है, जिसकी एक छोर पर जेल है और दूसरी छोर  पे जज कोठी। बाजार से थोड़ी दूर पर ही कचहरी है।" वास्तव में आज भी आरा का ढ़ाँचा हॉल के वर्णन जैसा ही है।  हॉल के अनुसार सिपाही विद्रोह की ख़बर  के साथ ही आरा के अँगरेज़ अफसरों ने अपने बीवी-बच्चो को दानापुर भेज दिया जहॉ अंग्रेज़ो के दसवीं रेजिमेंट पर उनकी सुरक्षा का दायितव  था। अँगरेज़ महिलाये और बच्चों  को  गंगा नदी के रास्ते नाव द्वारा दानापुर भेजा गया। मेरठ, संथाल परगना में विद्रोही सिपाहियों के द्वारा अंग्रेज़ो को जान से मारने की घटनाओं  को देख कर ईस्ट इंडिया रेलवे के इंजीनियर बॉयल ने १७ जून १८५७ ने आरा में बिलियर्ड रूम के आगे एक दीवार का निर्माण कराया। ये बिलियर्ड रूम आपात स्तिथि में एक सुरक्षित गढ़ की तरह बना था।नयी दीवार विद्रोही सिपाहियों की गोली झेलने लायक थी और दीवार में बन्दूक रखने के लिए जगह जगह छेद  छोड़े गये ताकि अँगरेज़ विद्रोहियों पर गोली चला सके। बॉयल ने उस घर में रासन , पानी और शराब की व्यवस्था कर ली। उसे उम्मीद थी की अंग्रेज़ो को बिलियर्ड्स रूम में कुछ दिन रहना पर सकता है।  तब तक दानापुर से ५० सिख सिपाहियों की फौज भी अँगरेज़ अफसरों की मदद के लिए पहुंची जिनका नायक हूकन सिंह बात बात पर "परवाह नहीं" कह कर अंग्रेज़ो को उनकी सुरक्षा का दिलासा देता था।  हालाँकि अंग्रेज़ो को सिख सैनिको पर भी संदेह था पर कुछ ही दिनों में उनका संदेह दूर हो गया।  २७ जुलाई की सुबह आख़िरकार अँगरेज़ सेना की सातवीं , आठवीं और चालीसवीं रेजिमेंट ने आरा ओर धावा बोल दिया। विद्रोहियों ने अपना सरदार जगदीशपुर के राजपूत ज़मींदार बाबू वीर कुंवर सिंह को घोषित  किया।  विद्रोहियों ने आरा के सरकारी ख़ज़ाने को लूटा और जेल में बंद तमाम बंदियों को आज़ाद करा दिया। अँगरेज़ अफसरों को उम्मीद थी कि दानापुर से अँगरेज़ फौज दिनों के भीतर उनकी मदद को  जाएगी।जब दिनों तक अँगरेज़ फौज नहीं पहुंची तो बिलियर्ड्स रूम के अंदर पानी की कमी होने लगी।  ये देखते हुए महज घंटे के भीतर सिख फौज ने १२ फ़ीट गहरी कुआँ  खोद डाली। इधर पटना से अंग्रेज़ो की पहली फौज जो आरा में मदद के लिए आयी, उसे विद्रोही सिपाहियों ने आम के घने बाग़ में घात लगा कर हमला किया और वापस जाने पर मजबूर कर दिया।  आखिरकार  अंग्रेज़ो ने विन्सेंट आयर  के नेतृत्व में ३० जुलाई १८५७ को आरा पर हमला किया और बिलियर्ड्स रूम में बंद अँगरेज़ अफसरों को छुड़ाया। बाबू वीर कुंवर सिंह जो विद्रोहियों के सरदार थे; वो ८० वर्ष के थे।  इस उम्र में भी उन्होंने आरा की लड़ाई के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उन्होंने आरा के बाद लखनऊ में नाना साहेब के साथ मिलकर १८५८ में आजमगढ़ पर कब्ज़ा किया। बाबू वीर कुंवर सिंह के बारे में कहा जाता है की उन्होंने ब्रिगेडियर डगलस की गोली लगने के बाद अपने हाथ को अपनी ही तलवार से काट कर गंगा को समर्पित कर दिया। ८० साल की उम्र में ऐसा हौंसला कम  ही देखने को मिलता हैं। आज भी वो बिलियर्ड हाउस आरा में उपस्तिथ है और अपने जीर्णोद्धार की बाट  जोह रहा है।  हालाँकि सरकार ने बिलियर्ड हाउस को बाबू वीर कुंवर सिंह संग्रहालय घोषित  किया है पर वहाँ देखने के लिए शायद ही कुछ है।

बिलियर्ड रूम 

आज आरा की पहचान यहाँ के युवा है। आप इस जिले के किसी कोने में चले जाइये।सुबह सुबह  सेना/पुलिस भर्ती के लिए दौड़ते लड़के मिल जायेंगे। सरकारी नौकरी का यहाँ चस्का है।  बैंक / रेलवे / सचिवालय की नौकरी के लिए तैयारी  करते लड़के/लड़की आपको ट्यूशन जाते दिख जायेंगे। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरी में फर्राटेदार अंग्रेजी की जरूरत को देखते हुए शहर में अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ गयी है जहाँ उनके नाम के सिवा कुछ भी अंग्रेजी नहीं होता और अभिवावकों  से अनाप शनाप पैसे वसूले जाते है। स्टेशन से गोपाली चौक जाने पर आपको हज़ारो कोचिंग सेंटर के बैनर लगे मिलेंगे जो आपको आई आई टी से लेकर  बैंक पी. तक बनाने का दावा  करते है।  भोजपुरी आरा की जान है। भोजपुरी सिनेमा के पोस्टर राह चलते आपको दिखेंगे। नुक्कड़ों पर पवन सिंह के गाना सुनेंगे। आस पास के गाओं  की जनता बाजार करने आरा आती है। आरा के बाजार आपको दिन में लोगो से ठसाठस भरे मिलेंगे।  रोड की चौड़ाई  १८५७ के बाद से शायद ही बदली है और जनसँख्या उसे से कई गुणा अधिक। अगर चेन्नई  में आपको इडली - डोसा, दिल्ली में आलू पराठा और कोटा में पोहा जलेबी के ठेले राह चलते दिख जाते है तो आरा में लिट्टी चोखा बिकते दिखेंगे। और अगर आप मीठे खाने के शौक़ीन है तो आरा का खुरमा काफी प्रसिद्ध है।
लिट्टी चोखा 

You can read the original book Two months at Arrah by clicking here.
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