Saturday, March 30, 2013

सबने मुखौटा पहना है।


पता नहीं रात के कितने बजे थे। अँधेरा अभी भी था। आस पास हाथ टटोला। अपना फ़ोन धुंद रहा था मैं। मिल गया, तकिये के नीचे था। नोटीफीकेशन चेक किया।
 १ मेसेज रिसीवड!
एल सी डी की तेज़ रोशिनी से आँखे छोटी हो गयी। मेसेज में बस मेरा नाम था। किसका मेसेज था, ये देखने की जरूरत ही नहीं थी। अलग ही मज़ा है, ये मेसेज पढने का। नींद में बरबस ही हाथो ने हरकत की, उंगलियों को अपना रास्ता पता था। हरे रंग का एक मात्र बटन दबाते ही उसकी निन्दियाई अलसाई “हेल्लो” सुन ने को मन उतावला हो गया।
मेरी आँखे बंद थी। कानो में घंटी की आवाज़ जा रही थी। पूरी घंटी बाज़ गयी; उस ने फ़ोन नहीं उठाया। आधी नींद नशे  की तरह होती है। ज्यादा बुरा नहीं लगता। फ़ोन कब  हाथ से छुट कर बिस्तर पर गिरा, पता ही नहीं चला। 
टिंग की आवाज़ के साथ नींद खुली।
मैंने मेसेज खोला। 
“विल यू रेमेम्बेर मी आलवेज़  लाइक दिस?”
मेरा जवाब था- “परहेप्स, कल किसने देखा”
इसके बाद मैं फिर एक बार नींद के सागर में खो गया। सुबह हुयी। नींद खुली। याद आया आज कितने काम है। ये मीटिंग, वो मीटिंग, रास्ते का ट्रैफिक जाम, भारत में भ्रस्टाचार, बढती मंहगाई, क्रिकेट में भारत की हार। और इन सबके बीच मेरे पैसे कमाने की दौड़।   तभी अचानक से रात की मासूमियत  और कोमलता याद आ गयी। क्या हर दिन रोज़मर्रा का काम उस कोमलता से होगा? ऑफिस पहुंचा। अपनी टीम को बुलाया। प्रोजेक्ट की प्रगति के बारे में पूछा। असंतुष्ट हुआ, सब पर चिल्लाया। मेरे ऊपर वाले मुझ पर चिल्लाते है। क्या यहाँ मासूमियत और कोमलता से काम बनेगी? शायद नहीं। मुखौटा लगाना पड़ता हैं। लोग बुरे नहीं होते। सबने मुखौटा पहना है।
Post a Comment