Thursday, March 28, 2013

बुरा न मानो होली है!!!


माँ का फ़ोन आया था। कह रही थी, नए कपडे खरीद लेना; कल होली जो है। आज ऑफिस से वापस आने में लेट हो गया। महीने के अंत में काम ज्यादा होता है। ८ से ८ ऑफिस में बिताने के बाद मैं ऑफिस के कोनों को घर से ज्यादा अच्छी तरह पहचानता हूँ। घर तो बस रात में सोने आता हूँ। अच्छा होता अगर कंपनी वाले ऑफिस में ही एक बिस्तर दे देते। खैर अब खुद को कोसने से क्या होगा। महीने के अंत में अच्छे-खासे पैसे तो आते है। पापा खुशरहते है – ,”बेटा एम०एन०सी में काम करता है, ७ अंको में सैलरी मिलती है। जब भी वापस घर जाने की बात सोचता हूँ, दोस्त बोलते है,”वापस जा कर क्या करेगा! बैंगलोर में लाइफ है। वहां तेरे लेवल के लोग नहीं मिलेंगे। ये नहीं होगा …..वो नहीं होगा …..फलाना ठिकाना” 
चलो मान लिया। लाइफ मतलब शायद १ घंटे काम करना होता है और उसके बाद २ घंटे गाड़ियों के धुओं में घुटना होता है। कल होली है, और मैं पूरा दिन सो कर बिताऊंगा। रात में शायद किसी रेस्तरां में जा कर ओवर प्रआइसड खाना खाऊंगा। दुनिया को गाली दुँगा और फिर गले दिन से वही रूटीन। साथ में काम करने वालो को बोलूँगा,”फलाना फाइव स्टार होटल में डिनर किया। यही लाइफ है भाई। हो सकता है बाज़ार से सबसे महंगा “हर्बल गुलाल” खरीद लूँ और जितना बड़ा टीका पंडित जी लगाते है, उतना ही गुलाल दोस्तों को लगा कर फोटो खिचवा लूँ। अगले दिन फेसबुक पर ,”फन विद फ्रेंड्स” या “मस्ती इन होली” एट मैरीयट डाल कर खुश हो जाऊ। यही लाइफ है।
कल  होली है। सुबह मैं ३ हज़ार का शर्ट पहन कर बाज़ार घूम आया। क्या मजाल था जो हमारे बचपन के दिनों में कोई साफ़ सुथरा शर्ट पहन कर घूम आये। माँ १ सप्ताह पहले से ही पुराने कपडे पहनाने लगती थी। न जाने किस छत से बाल्टी भर रंग आपके ऊपर गिर जाये और उसके बाद “बुरा न मनो होली है” का शोर। बच्चो के उत्साह को देख कर कपडे ख़राब होने के गम में भी आप चुपके से मुस्कुरा देते। होली आने से पहले ही गलियाँ लाल हरे रंग से नहा उठती थी। अब तो क्या है की रंग वाले केमिकल से चेहरा ख़राब होता है। पानी की भी कमी है। नहाने क लिए पानी तो है नहीं, दुसरो पर क्या पानी डाले! आज कल के बच्चे काफी बीजी हो गए है।  वाट्स एप और जी टॉक से फुर्सत नहीं मिल पाती। भाई, हमारे मोहल्ले में तो बच्चो के भी गैंग  हुआ करते थे। गैंग का इलाका भी होता था। अगर एक गैंग का बच्चा दुसरो के इलाके में पहुँच जाये तो उसे 
बन्दर बना कर ही छोड़ते थे। अब ऐसा है की बच्चा पड़ोस के बच्चो को तो जानते नहीं, इलाका क्या बनायेंगे। पिचकारी भी ज़रा आउट ऑफ़ फैशन हो गया है, शायद उनकूल है इसलिए। 
मैं भी कहाँ खो गया। टोरेंट पर कुछ डाउनलोड के लिए लगा देता हूँ। आज छुट्टी है। कल होली है। 
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