चिठ्ठी

बेटी की चिठ्ठी पढ़ी। खुश है वो अपने ससुराल में। कम से कम उसने लिखा तो यही। दामाद पुणे में रहता है। बड़ा शहर, बड़े खर्चे, बड़ी जिम्मेदारियाँ। कल तक तो इतनी छोटी थी मेरी गुड़िया, आज ना जाने कैसे इतनी सारी जिम्मेदारियाँ संभालती होगी। 


कोई शिकायत नहीं थी उसकी चिठ्ठी में। मानो वो अपनी ख़ुशी से ही सबको खुश कर देना चाहती हो। मन तो करता है कि जा कर एक दफा देख आऊं अपनी बेटी का घरौंदा। पर कभी मौका ही नहीं मिला। चौधरी जी आये थे आज, अपने पैसो का तकादा करने, किसी तरह हाथ-पैर पकड़ कर दो महीनो की मोहलत मांगी। २ लाख लिए थे उनसे, दहेज देने के लिए। आज कल दहेज़ की रकम भी तो इतनी बढ़ गयी है, बचपन से अपनी बच्ची तो पूरे लाड-प्यार से पला हैं। मानता हूँ कि उसे और भी पढ़ा सकता था पर जितना मुमकिन था उतना किया। अपनी हैसियत के अनुसार पढ़ाया और शादी की। अब मैं खुद को तो नहीं बेच सकता ना। बेटी मुझे दोष दे सकती है कि मैं उस से प्यार नहीं करता। क्यूंकि मैंने उसे छोटू की तरह कान्वेंट में नहीं पढ़ाया। क्यूंकि मैंने उसे डांस क्लास के पैसे नहीं दिए। क्यूंकि, मैंने उसे अच्छे कपड़े नहीं पहनाये। पर बेटी, मेरी जगह होती तो तुम भी शायद वही करती जो मैंने किया। दुनियादारी देखनी होती है, तुम्हारी दादी के इलाज़ के लिए पैसे बचाने होते हैं। मेरा खुद का तो कोई रिटायर्मेंट प्लान भी नहीं है। ना मुझमे गलत काम करने की शक्ति है, और ना ही कोई गलत स्रोत से आमदनी। तुमने तो अपने पापा को सुबह से शाम तक पसीना बहाते देखा ही है, तब जाकर थोड़े-बहुत पैसे कमा पाते हैं तुम्हारे पापा। तुम्हारे पापा सुपरमैन नहीं है। दर्द तो मुझे भी होता है कि मैंने अपने बच्चे तो वो जिंदगी नहीं दी जो उन्हें चाहिए थी।

पर क्या पैसा ही हर ख़ुशी का राज़ है। हमने जो साथ में पल बिताए वो क्या थे? क्या वो तुम्हे खुश नहीं करते। पता नहीं अमीर होना कैसा लगता है लेकिन मेरी समझ से यादें एहसासों से बनती हैं। सुख-दुःख, प्रेम- घृणा ये सब मिल कर यादें बनाते हैं। पैसों की अहमियत तो दुनिया हमें सिखाती है। अगर हम एक पल के लिए अपनी जिंदगी में से उन लोगों को हटा दे जो हमारे लिए महत्यपूर्ण नहीं है तो शायद पैसे की अहमियत कम हो जाएगी खुशियों के लिए। आवश्यकताओं और इच्छाओं का अंत नहीं है। खुशियाँ तो जिंदगी के टुकड़ों में होती है। अगर हम ये सोच कर बैठे कि शायद हमारी जिंदगी में कोई ऐसा समय आएगा जब हमारी जिंदगी में सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी तो मेरी समझ से ऐसा कोई समय नहीं होता है। खुशियों को ढुढ़ना पड़ता है। मेरा विश्वास करो, थोड़ी बहुत दुनिया मैंने भी देखी है।
Post a Comment

Popular posts from this blog

angrezi paper; Nandan, Champak and Nanhe Samrat

Arrah - The story of 1857

Gaja - The Bangalore traffic diary