बुरा भी लगता है।

एन-डी-टी-वी  के रवीश कुमार का एक इंटरव्यू देख रहा था।  हालाँकि आदत है रवीश जी को इंटरव्यू लेते हुए देखने कि पर इस बार वो इंटरव्यू दे रहे थे।  काफी रोचक व्यक्तित्व के मालिक है रवीश जी।  हर मुद्दो पर उनकी राय अनोखी होती है।  अनोखी इसलिए नहीं कि वो कुछ बड़ी बड़ी बातें करते है, या कुछ हट कर बातें करते है।  अनोखी इसलिए क्यूंकि जमीन  से जुडी बातें करते है।  ऐसा नहीं लगता कि सामाजिक - राजनैतिक विषयों का प्रकांड पंडित बातें कर रहा है, बल्कि उनकी बातें हमारी बात होती है।  बिहार के किसी छोटे कस्बे  में चल जाइये, मोहल्ले की कोने में चाय पीते हुए आम जनता सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य की ठीक उसी तरह विश्लेषण करती है जैसी रवीश जी करते है।  


मसलन  रवीश जी कहते है कि मुझे ट्रेन  के खाने से कोई शिकायत नहीं है, कौन सा बार बार खाना है, एडजस्ट कर लीजिये। मुझे याद आती है अपने पापा की, पापा के मित्र की , और ट्रैन के स्लीपर बोगी में चलने वाले सहयात्रियों की  जिनको मैंने ये बोलते सुना है।   

जिस समय में हम रह रहे है, ये समय काफी क्रन्तिकारी है।  बड़े शहरो कि बातें नहीं करूँगा।  अपने शहर कि बात करता हूँ। लड़कियोँ आगे बढ़ रही है।  पहले ट्यूशन पढ़ने के लिए भी जाती थी तो घर का कोई छोड़ने आता था।  आज मेरे साथ स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियाँ  पुणे- बैंगलोर में नौकरी करती है। अच्छा परिवर्तन है ये। आज कल दसवी बारहवी के बच्चे बाइक  पर घूमते है।  क्या ये अच्छी मजबूत होती अर्थव्यवस्था का परिणाम है ? ये हमारी सोच बदल गयी है ? साइकिल लोग खरीदते है स्वास्थ  के नाम पर, और वो भी १०-२५ हज़ार की। ऐसा नहीं लगता कि साइकिल इसलिए ख़रीदा गया क्यूंकि साइकिल चलना कूल है? वर्ना ३००० में  भी साइकिल मिलती है।  बनावटीपन बढ़ गया है समाज में। मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा हूँ, बुरा भी लगता है।
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