Sunday, December 11, 2016

द्वन्द

सुनो ना, सुनो ना,
जैसा था कल,
वैसा ही तो है आज,
फिर क्या नया है तुम में ।

ये मैं हूँ जो बेचैन ,
ये जो लगी है घुडदौड़ ,
क्यूँ मैं भाग रहा हूँ,
और तुम हो स्थिर ।

कहाँ हूँ मैं, कहाँ हो तुम,
ये दुनिया अलग तो नहीं,
ये रास्ता भूलभुलैया तो नहीं,
कहाँ है अंत, कहाँ हैं हम ।

ना खिलौनेवाली कार,
ना चाय का कप,
ना तुम्हारी नैसर्गिक हँसी ,
कहाँ है मेरी ख़ुशी ।

कहाँ जाना है,
जब गंतव्य का पता नहीं,
तो अंत की आकांक्षा कैसी,
कौन बताएगा जाना है कहाँ ।

क्या है ये सिर्फ कल की लड़ाई,
क्या है ये सिर्फ स्थिरता की चाह,
क्या है ये सिर्फ खुशियों की चाह,
ये द्वन्द, ये मन का भार।

सुनो ना, सुनो ना,
चलो अपना लेते हैं द्वन्द को,
चलो ढूंढते हैं द्वन्द का अंत,
शायद वही हो इस सफर का अंत।



द्वन्द 



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